राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Sunday, December 29, 2024

श्रीराम गीता-भाग १८ (अंतिम भाग )- भगवान राम का हनुमान जी को अवतार की दृष्टि से अपना परिचय देना

 

जो समस्त लोकों एवं संपूर्ण देहधारियों को मोह में डालने वाली है, वह माया भी मुझ ईश्वर के आदेश से ही सारा व्यवहार चलाती है ।

            

  जो मोहरूपी कलिल का नाश करके सदा परमात्म पद का साक्षात्कार कराती है, वह व्रह्मविद्या भी मुझ महेश्वर की आज्ञा के ही अधीन है । इस बिषय में बहुत कहने से क्या लाभ यह सारा जगत मेरी शक्ति से ही उत्पन्न हुआ है, मुझसे ही इस विश्व का भरण-पोषण होता है तथा अंततोगत्वा सबका मुझमें ही प्रलय होता है-


बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकंजगत ।।

मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं ब्रजेत् ।।

 

मैं ही स्वंयप्रकाश सनातन भगवान ईश्वर हूँ । मैं ही परब्रह्म परमात्मा हूँ । मुझसे भिन्न किसी बस्तु की सत्ता नहीं है । हनुमन ! यह परम ज्ञान मैंने तुमसे कहा है । इसे जानकर जीव जन्म-मृत्यु रूप संसार बंधन से मुक्त हो जाता है ।

 

पवननंदन मैंने माया का आश्रय लेकर राजा दशरथ के घर में अवतार लिया है । वहाँ मैं राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुहन इन चार रूपों में प्रकट हुआ हूँ । यह सारी बात मैंने तुम्हें बता दी । कपिश्रेष्ठ मैंने कृपापूर्वक तुम्हें अपने स्वरूप का परिचय दिया है । इसे सदा हृदय में धारण करते रहना चाहिए । कभी भूलना नहीं चाहिए ।


इसके बाद राम जी अपने और हनुमान जी के मध्य संवाद-श्रीराम गीता की महिमा-महात्म्य बताते हैं । और इसके पढ़ने-सुनने तथा पाठ करने का फल  आदि बताते हैं ।

 

फिर हनुमानजी अपने प्रभु श्रीराम को पहचानकर, जानकर उनकी बहुत सुंदर स्तुति किया।  


।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

 

Thursday, December 26, 2024

श्रीराम गीता-भाग १७-चौदहों भुवन तथा निखिल ब्रह्माण्ड मुझ परमात्म-देव के शासन से ही कार्यरत रहते हैं

 

भगवान राम हनुमान जी से कहते हैं कि जो नाम से अनंत हैं, जिनकी महिमा भी अनंत है तथा जो संपूर्ण देवताओं के प्रभु हैं वे शेष भी मेरी ही आज्ञा से समस्त लोक को सिरपर धारण करते हैं । जो सांवर्तक अग्निदेव नित्य बड़वारूप से स्थित हो संपूर्ण सागर के जल को पीते रहते हैं वे भी मुझ परमेश्वर के आदेश से ही चलते हैं ।

 

  आदित्य, वसु रूद्र, मरुद्गण, दोनों अश्वनीकुमार तथा अन्य संपूर्ण देवता मेरे शासन में ही रहते हैं । गंधर्व नाग, यक्ष, सिद्ध, चारण, भूत, राक्षस तथा पिशाच भी मुझ स्वयम्भू के शासन में ही स्थित हैं । कला, काष्ठा, निमेश, मुहूर्त, दिवस,क्षण,ऋतु, वर्ष, मास और पक्ष भी मुझ प्रजापति के शासन में स्थित हैं । युग, मन्वन्तर, परार्ध, पर तथा अन्यान्य कालभेद भी मेरी ही आज्ञा में स्थित हैं । चार प्रकार के समस्त स्थावर और जंगम प्राणी मुझ स्वयम्भू की आज्ञा से ही चलते हैं ।


 संपूर्ण नगर, चौदहों भुवन तथा निखिल ब्रह्माण्ड मुझ परमात्म-देव के शासन से ही कार्यरत रहते हैं । अतीत काल में जो असंख्य ब्रह्माण्ड हो गए हैं, वे भी संपूर्ण पदार्थ समूहों के साथ मेरी आज्ञा से ही अपने कर्तव्य पालन में प्रवृत्त हुए थे । चारों ओर भविष्यकाल में जो ब्रह्माण्ड होंगे वे भी अपनी समस्त वस्तुओं के साथ सदा मुझ परमात्मा की ही आज्ञा का पालन करेंगे । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन,बुद्धि, अहंकार तथा आदि प्रकृति भी मेरे आदेश से ही कार्य करते हैं ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

Tuesday, December 24, 2024

श्रीराम गीता भाग-१६- लक्ष्मी, सावित्री, सरस्वती और पार्वती आदि देवियाँ मेरी आज्ञा का अनुसरण करने वाली हैं

 

भगवान श्रीराम हनुमानजी से कहते हैं कि भगवान वैश्वानर अग्नि मुझ परमेश्वर के आदेश से ही अपने कतर्व्य के पालन में लगे हैं संपूर्ण जल की योनि स्वरूप जो देवेश्वर वरुण हैं वे मुझ परमेश्वर की आज्ञा से ही सबको जीवन प्रदान करते हैं । जो निरंजन परमदेव समस्त भूतों के भीतर-बाहर विराजमान हैं वे मेरी ही आज्ञा से प्राणियों के शरीर का भरण-पोषण करते हैं ।

 जो समस्त मानवों के जीवनदाता तथा देवताओं के लिए अमृत की खान हैं वे चन्द्रदेव मेरी ही आज्ञा से प्रेरित हो अपने कार्य में प्रवृत्त हैं । जो अपनी प्रभा से संपूर्ण जगत को प्रकाशित करते हैं वे सूर्य देव मुझ स्वयम्भू परमेश्वर के अनुशासन से ही वृष्टि का विस्तार करते हैं ।

 समस्त जगत के शासक तथा संपूर्ण देवताओं के ईश्वर जो इंद्रदेव हैं, वे मेरी आज्ञा से ही समस्त यज्ञों का फल देते हुए अपने कर्तव्य-पालन में संलग्न हैं । जो दुष्टों के शासक हैं वे सूर्यपुत्र यमदेवता मुझ देवाधिदेव परमात्मा के नियोग से ही इस जगत में नियम के अनुसार बर्ताव करते हैं ।

                   

  जो सब प्रकार की धन-संपत्ति के अध्यक्ष तथा धन के दाता हैं वे कुबेर भी मुझ ईश्वर के आदेश से अपने कर्तव्य के पालन में संलग्न रहते हैं । जो समस्त राक्षसों के अधिपति औत तपस्वी जनों के फलदाता हैं वे निर्ॠतिदेव सदा मेरी आज्ञा के अनुसार ही चलते हैं । जो वेतालों और भूतों के स्वामी तथा भोगरूप फल प्रदान करने वाले हैं, वे संपूर्ण भक्तों के स्वामी ईशानदेव भी मेरी आज्ञा से ही चलते हैं ।

 

  जो अंगिरा के शिष्य, रुद्रगणों में अग्रगण्य तथा योगियों के रक्षक वामदेव हैं वे भी मेरी आज्ञा के अनुसार ही बर्ताव करते हैं । जो संपूर्ण जगत के पूज्य तथा विघ्नकारक हैं, वे धर्मनेता विनायक देव भी मेरे कथनानुसार ही कार्य करते हैं ।

 

    जो वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ तथा देवा सेना के अधिपति हैं, वे भगवान स्कंद भी नित्यप्रति  मुझ स्वयम्भू से प्रेरित होकर ही कार्य करते हैं । जो प्रजाओं के अधिपति मरीचि आदि महर्षि हैं, वे मुझ परमेश्वर के ही आदेश से विविध लोकों की सृष्टि करते हैं ।

  जो समस्त भूतों को प्रचुर संपत्ति प्रदान करती हैं वे भगवान नारायण की पत्नी लक्ष्मी देवी भी मेरे अनुग्रह से ही कार्यरत होती हैं । जो सरस्वती देवी विपुल वाकशक्ति प्रदान करती हैं वे भी मेरी आज्ञा से प्रेरित होकर ही अपने कार्य में तत्पर होती हैं ।

 

  जो स्मरण करते ही संपूर्ण पुरुषों का घोर नरक से उद्धार करती हैं, वे सावित्री देवी भी मुझ परमदेव की आज्ञा के अनुसार चलने वाली हैं । जो विशेषरूप से ध्यान करने पर ब्रह्मविद्या प्रदान करने वाली हैं वे परादेवी पार्वती भी मेरी आज्ञा का अनुसरण करने वाली हैं ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

Sunday, December 15, 2024

श्रीराम गीता-भाग १५ – भगवान श्रीराम के सर्वात्मक और सर्वशासक स्वरूप का वर्णन - भाग दो )

  

भगवान राम आगे हनुमानजी से कहते हैं कि महतत्व आदि के क्रम से ही मेरे तेज का विस्तार हुआ है । जो संपूर्ण जगत के साक्षी कालचक्र के प्रवर्तक हिरण्यगर्भस्वरूप  मार्तण्डदेव (सूर्यदेव) हैं, वे भी मेरे ही दिव्य स्वरूप से प्रकट हुए हैं । मैंने उन्हें अपना दिव्य ऐश्वर्य, सनातन योग प्रदान किया है ।

 

कल्प के आदि में मुझसे प्रकट हुए चार वेद मैंने ही ब्रह्माजी को दिए थे । सदा मेरे ही भाव से भावित ब्रह्मा मेरी आज्ञा से सृष्टि करते हैं और मेरे उस दिव्य ऐश्वर्य को सदा वहन करते हैं ।

  सर्वज्ञ ब्रह्मा मेरे आदेश से ही संपूर्ण लोकों के निर्माण में संलग्न हुए हैं । आत्मयोनि ब्रह्मा मेरी ही आज्ञा से चार मुखों वाले होकर सृष्टि रचना करते हैं ।

 

 संपूर्ण लोकों के उद्भव तथा प्रलयस्थान जो अनंत भगवान नारायण हैं, वे भी मेरी ही परम मूर्ति हैं जो जगत के पालन में लगे हैं । जो संपूर्ण विश्व के संहारक भगवान कालरूद्र हैं, वे भी मेरे ही शरीर हैं तथा मेरी ही आज्ञा से सदा संहार कार्य में प्रवृत्त रहते हैं ।

 

  जो हव्यभोजी देवताओं को हव्य पहुँचाते हैं, कव्यभोजी पितरों को कव्य की प्राप्ति कराते हैं तथा अन्न का परिपाक करते रहते हैं वे अग्नि देव भी मेरी शक्ति से प्रेरित हो लोगों के खाये हुए आहार-समूह का दिन-रात पाचन करते हैं ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

Friday, December 6, 2024

वानर रूप में शिव भगवान केसरीनंदन जय हनुमान

 

।। श्रीहनुमते नमः ।।

 

वानर रूप में शिव भगवान ।

केसरीनंदन जय हनुमान ।।१।।

अंजनानंदवर्धन सुत वात ।

अघटित घटन विश्वविख्यात ।।२।।

ह्रदय विराजत कोसलभूप ।

सुंदर श्यामल रूप अनूप ।।३।।

रामदूत अन्वेषण पंडित ।

महाबली सुर नर मुनि वंदित ।।४।।

मन को अगम करत सोउ काज ।

हरि हर विधि वरनत रघुराज ।।५।।

दीन मलीन राम से जोरत ।

बार-बार रघुनाथ निहोरत ।।६।।

रोग दोष दुख कष्ट मिटावत ।

दीनबंधु रघुवीर मिलावत ।।७।।

भूत प्रेत ग्रह क्रूर नसावत ।

अशुभ प्रभाव निकट नहि आवत ।।८।।

रामदूत कपिश्रेष्ठ जो ध्यावत ।

लोक और परलोक बनावत ।।९।।

सीता राम लखन जन गावत ।

हर गिरजहुँ की कृपा पावत ।।१०।।

सुर नर मुनि के बंध छुड़ावत ।

रामदास जन काज बनावत ।।११।।

दीन संतोष शीश पद नावत ।

सुनौ कपीस तोहिं गोहरावत ।।१२।।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

 

Sunday, November 3, 2024

जय बजरंगबली गिरिधारी विग्रह बानराकार पुरारी

 

 । श्रीहनुमते नमः 


जय बजरंगबली गिरिधारी ।

विग्रह बानराकार पुरारी ।।१ जय. ।।

राम काज कारन बपु धारी ।

मंगल मूल अमंगल हारी ।।२ जय. ।।

लहत मोद प्रभु वदन निहारी ।

रामभक्त सेवक हितकारी ।।३ जय. ।।

निज सेवा बस किहेउ खरारी ।

सुखसागर श्रीराम सुखारी ।।४ जय. ।।

साधु संत सुर नर मुनि नारी ।

गावत गुन कहि महिमा भारी ।।५. जय. ।।

बाल समय मुख धरेउ तमारी ।

छाई लोक सकल अँधियारी ।।६. जय।।

विनय सुनत लखि लोक दुखारी ।

छाड़ेउ रवि फैली उजियारी ।।७ जय. ।।

सीता खोजि भालु कपि हारी ।

बोले बस अब आस तुम्हारी ।।८ जय. ।।

सीता सुधि लायेउ पुर जारी ।

राम कहेउ सुत बड़ उपकारी ।।९ जय. ।।

लखन गिरेउ जब समर मझारी ।

दिहेउ सजीवन द्रोण उपारी ।।१० जय. ।।

नाग फाँस बस देखि अघारी ।

महावीर लायेउ उरगारी ।।११ जय. ।।

सेन सहित अहिरावण मारी ।

अनुज सहित लायेउ दनुजारी ।।१२ जय. ।।

गिरि गोवर्धन उपकृत भारी ।

वृजमण्डल महुँ थपेउ विचारी ।।१३ जय. ।।

पारथ रथ ध्वज कहे मुरारी ।

बसे विजय भारत अधिकारी ।।१४ जय. ।।

साधु संत सब कहत पुकारी ।

राखे कोटि गरीब सुधारी ।।१५ जय. ।।

राम तात सीता महतारी ।

अब जनि राखो मोहि बिसारी ।।१६ जय. ।।

कृपा कोरि मोहि बेगि निहारी ।

रामदूत अब लेउ उबारी ।।१७ जय. ।।

दीन संतोष करवरें टारी ।

होउ सहाय दीन दुख हारी ।।१८ जय. ।।

 

 । जय बजरंगबली गिरिधारी की 

Sunday, September 1, 2024

श्रीराम गीता-भाग १४ (भगवान श्रीराम के सर्वात्मक और सर्वशासक स्वरूप का वर्णन- भाग एक)

 

भगवान श्रीराम कहते हैं कि पवननंदन ! मैं संपूर्ण लोकों का एकमात्र स्रष्टा, सभी लोकों का एकमात्र पालक, सभी लोकों का एकमात्र संहारक, सबकी आत्मा सनातन परमात्मा हूँ ।

सर्वलोकैकनिर्माता  सर्वलोकैकरक्षिता ।

सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं  सनातनः ।।

 

मैं समस्त वस्तुओं के भीतर रहने वाला अन्तर्यामी आत्मा तथा सबका पिता हूँ । सारा जगत मेरे ही भीतर स्थित है, मैं इस संपूर्ण जगत के भीतर स्थित नहीं हूँ । वत्स ! तुमने जो मेरा अद्भुत स्वरूप देखा है, यह मेरी एक उपमा मात्र है । इसे मैंने माया द्वारा दिखाया है । मैं सभी पदार्थों के भीतर रहकर संपूर्ण जगत को प्रेरित करता हूँ । यह मेरी क्रिया शक्ति का परिचय है ।

                   

हनुमन ! यह संपूर्ण विश्व मेरे सहयोग से ही चेष्टाशील होता है । यह मेरे स्वभाव का ही अनुसरण करने वाला है । मैं ही सृष्टिकाल में समस्त जगत की रचना करता हूँ । तथा एक दूसरे रूप से इसका संहार भी करता हूँ । ये दोनों प्रकार की अवस्थाएँ मेरी ही हैं ।

 

मैं आदि,मध्य और अंत से रहित तथा माया तत्व का प्रवर्तक हूँ । मैं ही सृष्टि के आरंभ में प्रधान और पुरुष दोनों को क्षुब्ध करता हूँ । फिर परस्पर संयुक्त हुए उन दोनों से ही सबकी उत्पप्ति होती है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

Saturday, August 10, 2024

श्रीराम गीता- भाग तेरह (भक्ति योग- पाँच)-महायोगेश्वरेश्वर भगवान राम

 

(भगवान श्रीराम का हनुमानजी को भक्ति योग का उपदेश )

 

मेरी आराधना के अभिलाषी अन्य जो तीन प्रकार के भक्त हैं वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं और पुनः लौटकर इस संसार में नहीं आते-

 

अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकान्क्षिणः ।

तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः ।।

 

मैंने ही सम्पूर्ण जगत का विस्तार किया है- जो इस बात को जानता है वह अमृतस्वरूप हो जाता है । मैं इस जगत को स्वभाव से ही वर्तमान देखता हूँ । जिसे महायोगेश्वर साक्षात भगवान ने समयानुसार रचा है । वे ही योगशास्त्र के वक्ता हैं । इसलिए शास्त्रों में उन्हें योगी और मायावी कहा गया है ।

 

  विद्वानों ने उन्हीं महाप्रभु भगवान महादेव को योगेश्वर कहा है । सम्पूर्ण जीवों से महान होने के कारण परमात्मा को महेश्वर कहा गया है और वे ही सबसे परे होने के कारण परमेश्वर कहे जाते हैं । महान ब्रह्मय होने से ही उनका नाम भगवान ब्रह्मा है । यह सब मेरे ही स्वरूप का परिचय है ।

 

जो मुझे इस प्रकार महायोगेश्वरेश्वर जानता है वह अविचल योग से युक्त होता है इसमें संशय नहीं है -

यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम् ।

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ।।

 

वही मैं सबका प्रेरक परम देव परमानंद का आश्रय ले सर्वत्र विराजमान हूँ । जो योगी सदा इस प्रकार मुझे जानता है वही वेदवेत्ता है । यह सम्पूर्ण वेदों में निश्चित रूप से प्रतिपादित गुह्यतम ज्ञान है । जो प्रसन्नचेत्ता धर्मात्मा एवं अग्निहोत्री हो, उसे इसका उपदेश देना चाहिए ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।

Sunday, August 4, 2024

श्रीराम गीता- भाग बारह (भक्ति योग- चार)


(भगवान श्रीराम का हनुमानजी को भक्ति योग का उपदेश )

 

मैं ही संपूर्ण शक्तियों का प्रवर्तक, निवर्तक सबका आधारभूत तथा अमृत की निधि हूँ

अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः ।

आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च ।।

 

 मेरी एक सर्वांतर्यामिनी शक्ति ब्रह्माजी के रूप में स्थित होकर विविध नाम-रूप वाले जगत की रचना करती है । दूसरी शक्ति अनंत जगन्नाथ, जगन्मय, नारायण होकर इस विश्व का पालन करती है । तीसरी जो मेरी महाशक्ति है वह संपूर्ण जगत का संहार करती है । उसे तामसी कहा गया है । वह कालात्मा एवं रुद्ररूपिणी है ।

 

  कुछ साधक मुझे ध्यान के द्वारा देखते हैं । दूसरे लोग ज्ञान से, अन्य लोग भक्तियोग के द्वारा मेरा साक्षात्कार करते हैं । तथा कतिपय साधक कर्मयोग के द्वारा मेरा साक्षात्कार करते हैं-

ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे ।

अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे ।।

 

सभी भक्तों में मुझे वह सबसे प्रिय है, जो विशुद्ध ज्ञान के द्वारा मेरी नित्य आराधना करता है, अन्य किसी साधन से नहीं-

 

सर्वेषामेव भक्तानामेष प्रियतरो मम ।।

यो विज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा ।।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।


Thursday, July 25, 2024

श्रीराम गीता- भाग ग्यारह (भक्ति योग- तीन)-धर्मात्माओं का रक्षक तथा वेदद्रोहियों का विनाश करने वाला मैं ही हूँ

 

 (भगवान श्रीराम का हनुमानजी को भक्ति योग का उपदेश )

 

मैंने ही परमेष्ठी ब्रह्मा को कमलपर स्थापना करके उन्हें संपूर्ण वेदों का ज्ञान दिया था । जो उनके मुखों से प्रकट हुए ।

 

मैं ही समस्त योगियों का अविनाशी गुरू हूँ । धर्मात्माओं का रक्षक तथा वेदद्रोहियों का विनाश करने वाला मैं ही हूँ –

 

अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः

धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेदविद्विषाम् ।।

 

मैं ही योगियों को समस्त संसार बंधन से मुक्त करता हूँ । संसार का हेतु भी मैं ही हूँ और समस्त संसार से परे भी मैं ही हूँ –

अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह ।

संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसार वर्जितः ।।

 

मैं ही स्रष्टा, पालक और संहारक हूँ । माया का स्वामी भी मैं ही हूँ । मेरी शक्तिस्वरूपा माया समस्त लोक को मोह में डालने वाली है-

अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः ।

मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी’ ।।

 

जो मेरी ही पराशक्ति है, उसे विद्या कहते हैं । मैं उसी विद्या के द्वारा योगियों के ह्रदय में रहकर माया का विनाश करता हूँ ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।

Friday, July 12, 2024

श्रीराम गीता- भाग दस –भक्तों के लिए रामजी की प्रतिज्ञा का वर्णन (भक्ति योग-दो)

 

धार्मिक वेदवादी विद्वान ज्ञान दृष्टि से मुझे देखते हैं । जो भक्तजन मेरी उपासना करते हैं, उनके निकट मैं नित्य निवास करता हूँ- ‘तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्ता मामुपासते’ ।

 

जो ब्राह्मण, क्षत्रीय तथा धार्मिक वैश्य मेरी आराधना करते हैं, उन्हें मैं अपना परमानंदमय धाम-परमपद प्रदान करता हूँ । दूसरे भी शूद्र आदि जो विपरीत कर्म में लगे रहने वाले तथा नीच जाति के हैं, वे भी यदि भक्ति भाव से मेरा भजन करते हैं तो इस संसार बंधन से मुक्त हो जाते हैं और समयानुसार मुझमें मिल जाते हैं ।

 

  मेरे भक्तों का कभी विनाश नहीं होता । मेरे भक्तों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । मैंने पहले से ही यह घोषणा कर रक्खी है कि मेरे भक्त का नाश नहीं होता है-

न मद्भक्ता विनश्यन्ते मद्भक्ता वीतकल्मषाः ।

आदावेत्तप्रतिज्ञातं न में भक्तः प्रणश्यति ।।

 

जो मूढ़ मेरे भक्त की निंदा करता है, वह मुझ देवाधि भगवान की ही निंदा में रत है । जो भक्तिभाव से भक्त का पूजन करता है, वह सदा मेरी ही पूजा में लगा हुआ है । जो मेरी आराधना के निमित्त से मुझे पत्र-पुष्प, फल और जल अर्पित करता है तथा मन और इन्द्रियों को काबू में रखता है, वह मेरा भक्त माना गया है ।

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।

Thursday, July 11, 2024

श्रीराम गीता- भाग नौ –भक्ति योग-(एक)

 

   ( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )

 

हे पवननंदन अब मैं पुनः जो बात बता रहा हूँ उसे एकाग्र होकर सुनों । जिससे इस रूप की प्राप्ति होती है तथा जिससे यह जगत व्यवहार में प्रवृत्त होता है वह तत्व मैं ही हूँ ।

 

 मुझे मनुष्य नाना प्रकार के तप, दान तथा यज्ञों के अनुष्ठान से नहीं जान सकते । मेरी परम उत्तम भक्ति को छोड़कर और किसी उपाय से मेरा सम्यक ज्ञान नहीं हो सकता ।

 

 मैं ही संपूर्ण पदार्थों के भीतर अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ, सवर्त्र व्याप्त हूँ । मैं ही सबका साक्षी हूँ । किंतु संसार के लोग मुझे इस रूप में नहीं जानते । जिसके भीतर यह सारा प्रपंच विद्यमान है, जो सबका अंतरात्मा, परम पुरुष है वह मैं ही हूँ ।

 

मैं ही इस लोक में धाता और विधाता के नाम से प्रसिद्ध हूँ । मेरे सब ओर मुख हैं । मुनि, संपूर्ण देवता, ब्राह्मण, मनु, इंद्र तथा अन्य प्रख्यात तेजस्वी पुरुष भी मुझे नहीं देखते ।

 

  वेद मुझ परमेश्वर का ही सदा स्तुति करते हैं । ब्राह्मण लोग भाँति-भाँति के वैदिक यज्ञों द्वारा मुझ अग्निस्वरूप परमेश्वर का ही यजन करते हैं ।

 

मैं ही ब्रह्मलोक में पितामह हूँ । उस रूप में सब लोग मुझे ही नमस्कार करते हैं । योगी पुरुष भूतनाथ महेश्वरदेव के रूप में मेरा ही ध्यान करते हैं । मैं ही संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और फल देने वाला हूँ । संपूर्ण देवताओं का शरीर धारण करके मैं सर्वात्मा ही सबकी स्तुति-प्रशंसा का विषय हो रहा हूँ-


अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रदः ।

सर्वदेवतनुर्भू‍‌त्वा सर्वात्मा सर्वसंस्तुतः ।।  

 

।। जय श्रीराम ।।

।। जय श्रीहनुमान ।।

 

 

Monday, July 1, 2024

श्रीराम गीता- भाग आठ -उपनिषद सिद्धांत का निरूपण- तीन

 

( भगवान श्रीराम का हनुमानजी को उपदेश )

 

प्रकृति में आसक्ति होने से काल के द्वारा वह अविवेक दृढ हुआ है । काल ही प्राणियों की सृष्टि करता है और काल ही समस्त प्रजा का संहार करता है । सब लोग काल के वश में हैं । काल किसी के वश में नहीं है । वह सनातन काल सबके भीतर रहकर इस संपूर्ण जगत का नियंत्रण करता है । भगवान काल ही प्राण, सर्वग्य एवं परम पुरुष कहे जाते हैं ।

 

 संपूर्ण इंद्रियों से मन श्रेष्ठ है, ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है । मन से परे अहंकार है, अहंकार से परे महततत्व है, महततत्व से परे अव्यक्त है और अव्यक्त से परे पुरुष विराजमान है । पुरुष से परे भगवान प्राण हैं । यह संपूर्ण जगत उन्हीं की रचना है । प्राण से परे व्योम और व्योम से परे अग्निस्वरूप ईश्वर है । वह ईश्वर मैं हूँ ।

 

 मैं ही सर्वत्र व्यापक. शांत और ज्ञान स्वरूप परमेश्वर हूँ । मुझसे श्रेष्ठ कोई स्थावर-जंगम प्राणी नहीं है । जो मुझे जान लेता है वह मुक्त हो जाता है-

 

  सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः ।

  नास्ति मत्परमं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते ।।

 

संसार में कोई भी स्थावर-जंगम भूत नित्य नहीं है । एकमात्र मुझ अव्यक्त परमाकाशस्वरूप महेश्वर को छोड़कर सब कुछ अनित्य है । मैं ही  सदा संपूर्ण विश्व की सृष्टि और संहार करता हूँ । माया का अधिपति मायामय देवता मैं काल से संयुक्त हूँ । यह काल मेरे निकट रहकर ही सारे जगत की सृष्टि करता है । अनंतात्मा काल ही इस विश्व को विभिन्न कार्यों में नियुक्त करता है । यह वेद का उपदेश है ।

 


।। जय श्रीराम ।।

।। जय हनुमान ।।


विशेष पोस्ट

सुन्दरकाण्ड-४-हनुमान जी का सुरसा की परीक्षा में सफल होना- आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान

  हनुमानजी महाराज मैनाक पर्वत का आदर किया लेकिन उनके सत्कार के प्रस्ताव को अस्वीकार करके आगे बढ़ गए । क्योंकि हनुमानजी महाराज को राम काज किए ...

लोकप्रिय पोस्ट

कुछ पुरानी पोस्ट

Labels

pvn अंगदजी अंजना माता अंजना सुवन अंजनानंदवर्धन अद्वितीय अध्ययन अयोध्या अश्वनीकुमार आत्मा आत्मा का विज्ञान आत्मा क्या है आदित्य इन्द्रदेव उपदेश उपनिषद ऋतु ऋष्यमूक पर्वत किरात किष्किंधा केवट केसरी जी केसरी नंदन केसरीजी केसरीनंदन कोल क्षण गंधमादन पर्वत गीत गुरू गुरू दक्षिणा जटायुजी जामवंतजी जामवन्तजी जीव ज्ञान दिवस दीनबंधु देवगण निमेश पढ़ाई परमात्मा परीक्षा पर्वत पवनजी पवनतनय पवनदेव पाठ पार्वती पार्वतीजी पूँछ प्रश्न फल बजरंगबली बंदर बल बालाजी भक्त भक्ति yog भक्ति योग भगवान भगवान राम का विश्वरूप भगवान श्रीराम भालू भील भेद मतंग मुनि मन्वंतर महात्म्य महावीर माया मित्र मुहूर्त मैनाक पर्वत यमदेव योग राम राम दूत रामकाज रामजी लंका लक्ष्मणजी लक्ष्मी लोक वानर विद्या विराट स्वरूप विश्राम वेद शंकरजी शास्त्र शिक्षा शिव भगवान शिष्य श्रीराम श्रीराम गीता श्रीहनुमान सचिव सनातन संपातीजी समुद्र समुंद्र सरस्वती सांख्ययोग सावित्री सीताजी सीताजी की खोज सुग्रीव जी सुग्रीवजी सुन्दरकाण्ड सुमेरु पर्वत सुरसा सूर्य देव सूर्य देव जी सूर्यदेव सेवक स्तुति स्वामी हनुमान हनुमान जयंती हनुमान जी हनुमानजी हनुमानजी के गुरू