राम प्रभू के निकट सनेही । दीन मलीन प्रनत जन नेही ।।
अघ अवगुन छमि होउ सहाई । संतोष मिलैं जेहिं श्रीरघुराई ।।

Saturday, January 10, 2026

श्रीसुन्दरकाण्ड भाग -१७ -सीताजी से राम वियोग का वर्णन और रामजी की प्रभुता को याद दिलाकर सीताजी को धैर्य धारण कराना

 

हनुमानजी महाराज के हृदय में स्थिति राम जी बोले कि हे सीते ! मुझको सबकुछ उल्टा लगने लगा है । वृक्षों की नए-नए कोपलें अग्नि के समान लग रहे हैं । रात्रि कालरात्रि के समान और चंद्रमा सूर्य के समान प्रतीत हो रहा है । 

कमल के वन काँटों के वन की तरह लग रहे हैं ।  और वारिश ऐसे लगती है मानों बादल जल के स्थान पर गर्म-गर्म तेल की वर्षा कर रहे हों ।  जो-जो वस्तुएँ पहले हितकारी लगती थीं वे ही अब कष्टकारी लग रही हैं । शीतल,मंद और सुगंधित जो त्रिविधि वायु है वो साँप के स्वास के समान गर्म और जहरीली प्रतीत हो रही है ।

 

कहने से दुख थोड़ा कम हो जाता है । लेकिन किससे कहूँ कोई भी इस दुख को जानने वाला नहीं है । राम जी ने कहा कि मेरे और तुम्हारे प्रेम का जो सार यह है कि हे प्रिय तुम जानती हो कि मेरे एक ही मन है । और वह मन सदा आपके ही पास रहता है । इतने में ही अथवा इससे ही आप मेरी प्रीति के सार को जान लीजिए, समझ लीजिए । राम जी का ऐसा संदेश सुनकर सीता जी राम जी के प्रेम में मग्न हो गईं, खो गईं और उन्हें शरीर की कोई सुधि नहीं रही ।

 

तब हनुमानजी महाराज बोले कि हे माता आप हृदय में धैर्य धारण कीजिए और अपने भक्तों-सेवकों को सुख देने वाले भगवान श्रीराम को याद कीजिए । उनका सुमिरण कीजिए । आप अपने हृदय में राम जी की प्रभुता को लाइए । सोचिये, बैठाइए और मेरे बचनों को सुनकर कायरता को छोड़ दीजिए ।

 

भक्त अथवा भगवान के सेवक जब भगवान की प्रभुता को भुला देते हैं । अथवा परिस्थिति की विषमता देखकर अथवा दुख की भीषणता देखकर भगवान की प्रभुता विस्मृति हो जाती है तो अधीरता बढ़ती है । इससे दुख बढ़ता है । अथवा यूँ कहें कि यही दुख का कारण बनता है । अन्यथा यदि जीव को भगवान के गुण, उनकी दयालुता, सर्वव्यापकता, समर्थता, प्रभुता  आदि पर दृढ़ विश्वास रहे, सतत स्मरण रहे तो फिर दुख कहाँ ?

 

  लेकिन जब सीता जी को भगवान की प्रभुता विस्मृति हो सकती है तो साधारण जीव इससे कहाँ बच सकते हैं ।

 

हनुमान जी महाराज ने कहा कि राक्षस पतिंगे के समान और भगवान श्रीराम के वाण अग्नि के समान हैं । अतः हे माता आप इन्हें जला हुआ ही समझिए और हृदय में धैर्य धारण कीजिए ।

 

जैसे पतिंगे आग्नि के पास जाते ही समाप्त हो जाते हैं वैसे ही बस राम जी के आने की देरी है और राक्षस समाप्त । उनके अग्नि रुपी वाण की ओर राक्षस रुपी पतिंगे सहज ही खिचें चले आएँगे और स्वयं जलकर प्राणांत कर लेंगे । रामजी को कुछ करने की जरूरत नहीं है । बस यहाँ आना है और राक्षसों को उनके वाण का दर्शन होते ही सब जल मरेंगे ।

 

अतः हे माता आप अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए । और राम जी के सेवक सुख दायक वाने का सुमिरण कीजिए । यह सब सोचना छोड़ दीजिए कि राम जी कैसे आयँगे ? और इन पराक्रमी राक्षसों को कैसे मारेंगे ? क्योंकि ये पतिंगे हैं और इन्हें आप जला हुआ ही समझों ।

                                                            

।। जय श्रीसीताराम ।।

 

 

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