हनुमानजी महाराज के हृदय
में स्थिति राम जी बोले कि हे सीते ! मुझको सबकुछ उल्टा लगने लगा है । वृक्षों की
नए-नए कोपलें अग्नि के समान लग रहे हैं । रात्रि कालरात्रि के समान और चंद्रमा
सूर्य के समान प्रतीत हो रहा है ।
कमल के वन काँटों के वन
की तरह लग रहे हैं । और वारिश ऐसे लगती है
मानों बादल जल के स्थान पर गर्म-गर्म तेल की वर्षा कर रहे हों । जो-जो वस्तुएँ पहले हितकारी लगती थीं वे ही अब
कष्टकारी लग रही हैं । शीतल,मंद और सुगंधित जो त्रिविधि वायु है वो साँप के स्वास
के समान गर्म और जहरीली प्रतीत हो रही है ।
कहने से दुख थोड़ा कम हो
जाता है । लेकिन किससे कहूँ कोई भी इस दुख को जानने वाला नहीं है । राम जी ने कहा
कि मेरे और तुम्हारे प्रेम का जो सार यह है कि हे प्रिय तुम जानती हो कि मेरे एक
ही मन है । और वह मन सदा आपके ही पास रहता है । इतने में ही अथवा इससे ही आप मेरी
प्रीति के सार को जान लीजिए, समझ लीजिए । राम जी का ऐसा संदेश सुनकर सीता जी राम
जी के प्रेम में मग्न हो गईं, खो गईं और उन्हें शरीर की कोई सुधि नहीं रही ।
तब हनुमानजी महाराज बोले
कि हे माता आप हृदय में धैर्य धारण कीजिए और अपने भक्तों-सेवकों को सुख देने वाले
भगवान श्रीराम को याद कीजिए । उनका सुमिरण कीजिए । आप अपने हृदय में राम जी की
प्रभुता को लाइए । सोचिये, बैठाइए और मेरे बचनों को सुनकर कायरता को छोड़ दीजिए ।
भक्त अथवा भगवान के सेवक
जब भगवान की प्रभुता को भुला देते हैं । अथवा परिस्थिति की विषमता देखकर अथवा दुख
की भीषणता देखकर भगवान की प्रभुता विस्मृति हो जाती है तो अधीरता बढ़ती है । इससे
दुख बढ़ता है । अथवा यूँ कहें कि यही दुख का कारण बनता है । अन्यथा यदि जीव को
भगवान के गुण, उनकी दयालुता, सर्वव्यापकता, समर्थता, प्रभुता आदि पर दृढ़ विश्वास रहे, सतत स्मरण रहे तो फिर
दुख कहाँ ?
लेकिन जब सीता जी को भगवान की प्रभुता विस्मृति
हो सकती है तो साधारण जीव इससे कहाँ बच सकते हैं ।
हनुमान जी महाराज ने कहा
कि राक्षस पतिंगे के समान और भगवान श्रीराम के वाण अग्नि के समान हैं । अतः हे
माता आप इन्हें जला हुआ ही समझिए और हृदय में धैर्य धारण कीजिए ।
जैसे पतिंगे आग्नि के पास
जाते ही समाप्त हो जाते हैं वैसे ही बस राम जी के आने की देरी है और राक्षस समाप्त
। उनके अग्नि रुपी वाण की ओर राक्षस रुपी पतिंगे सहज ही खिचें चले आएँगे और स्वयं
जलकर प्राणांत कर लेंगे । रामजी को कुछ करने की जरूरत नहीं है । बस यहाँ आना है और
राक्षसों को उनके वाण का दर्शन होते ही सब जल मरेंगे ।
अतः हे माता आप अपने हृदय
में धैर्य धारण कीजिए । और राम जी के सेवक सुख दायक वाने का सुमिरण कीजिए । यह सब
सोचना छोड़ दीजिए कि राम जी कैसे आयँगे ? और इन पराक्रमी राक्षसों को कैसे मारेंगे
? क्योंकि ये पतिंगे हैं और इन्हें आप जला हुआ ही समझों ।
।। जय श्रीसीताराम ।।